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त्रिभुवन चित्त में लियो रमाय

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?मोरे कान्हाजी !

? ​ कृष्ण-मुरारी ❤ उर बसे ,
‘त्रिभुवन ‘ चित्त में लियो रमाय ।
नित-नित दर्शन मैं करूं ,
नैनन पलक झुकाय ।।

मेरे नैनन में बसे ,
राधा, नंद किशोर ।
पलकों की चिक डाल कर ,
मन हो दर्श विभोर ।।

नित्य रूप-रस ‘त्रिभुवन ‘ पिये ,
दर्शन कर “घनश्याम” ।
परमानंद प्रतीति हो ,
जीवन धन्य सकाम

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